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Introduction

व्यवसायिक बकरी पालन और इसकी वास्तविकता – एक परिचय

पारम्परिक बकरी पालन जो वर्षो से पूरे भारत में किया जा रहा है वही पारम्परिकता आज व्यावसायिक बकरी पालन का का आधार है| सामान्यत: जब लोग बकरी पालन को व्यवसायिक रूप से करने का विचार करते है तो उनके अंतर्मन में यह विचार आता है की जब एक गरीब आदमी बिना किसी वैज्ञानिक वयवस्था, प्रबन्धन और बहुत ही सीमित साधनों से इस बकरी पालन को सफलता पूर्वक संचालित कर रहे है और इस पर जनसामान्य में फैली यह ग्रामीण कहावत है कि बकरी तो साल में दो बार और दो बच्चे देती है व् बकरी पालन में तो सदा लाभ ही है | बाजार में बकरी के मांस की किमतों में लगातार वृद्धि इस बात को और अधिक पुख्ता साबित करती है | यही बात लोगो को इस व्यवसाय की और आकर्षित करती है

इसी मिथ्या आकर्षण और बिना किसी वैज्ञानिक जानकारी के आधार एवम् व्यावसाय का आर्थिक विश्लेष्ण किये बिना ही व्यक्ति बकरी पालन में मध्यम व् बड़े स्तर पर व्यवसाय को प्रारम्भ कर लेते है और कुछ समय बाद इसके परिणाम व्यवसायिक फार्म के आशा के विपरीत दिखाई पड़ते है और कई बड़े-बड़े बकरी फार्मस का बंद होना इसका सबूत है |

बकरी के बारे में प्रचलित एक वैज्ञानिक कहावत है की Goat is museum of parasite and diseases” जो पूरी तरह सत्य है, और वह अपने प्रतिरक्षा तंत्र से उन बीमारियो पर नियंत्रण रखती है परन्तु हैसे ही उसके वातावरण में किसी प्रकार का परिवर्तन होता है वो बीमार पड़ जाती है | सामान्यत: बकरी पालन शुरू करते समय बकरी पलक अपने आसपास बाजारों ,मंडियों आदि से बकरी खरीद लेता है जो सामान्यत: Non-vaccinated होती है आते ही उन पर वातावरण ,रखरखाव ,खान-पान आदि के बदलाव का तनाव पड़ता है और वह बीमार पड़ जाती है और बकरी पालक को प्रथम दो माह में एसी परिस्थिति का सामना करना पड़ता है जिसके बारे में वह पूरी तरह अंजान था | इस समस्या से कुछ ही बकरी पालक उभर पते है और लगभग 90 % लोग फार्म बंद कर देते है और 5 % ही इसे संचालित रखते है | परन्तु इन बचे हुए बकरी पालको का सामना एक अन्य समस्या से होता है वह बाजार व् बकरी का बाजार मूल्य व्यवसायिक बकरी पालन बकरी के पलने की एक input cost लगानी पड़ती है जो पारंपरिक बकरी पालन मे नहीं है और यह लगभग एक बकरी पर प्रति वर्ष 3 से 4 हजार रूपये आता है जबकि बकरी का बाज़ार मूल्य भी इससे कम या लगभग इतना हे रहता है इसलिए इस व्यवसाय से लाभ प्राप्त करना बहुत मुश्किल होता है | ऐसे में बकरी पालन चुनोती बन जाता क्यों की आहार व अन्य प्रबंधन खर्च की तुलना में आय नुनतम होती है | वही व्यवसायी बकरी पालन मे शासन की योजना व वित्तीय संसथान ऋण देने मे रूचि नही लेती है | बीमा कम्पनी बकरियों का बीमा नहीं करना चाहती है, देश में पशु-चिकित्सा सेवाओ की कमी, फिल्ड स्तर पर टीकाकरण का आभाव, आदि समस्याए भी बकरी पालन के व्यवसाय में अवरोध है |

इन सब बातों से मेरा आशय कदापि यह नही है कि बकरी पालन लाभकारी व्यवसाय नही है परन्तु यदि इस व्यवसाय से लाभ कमाना है तो हमें इसके लिए एक प्रायोगिक प्लानिंग की आवश्यकता है इसके लिए सबसे पहले बकरी पालन का प्रक्षिक्षण एवम जानकारी एकत्र करे, शासन की योजनाओ का लाभ लेकर बैंक से अनुदानित ऋण लेने का प्रयास कर निकटतम पशुचिकित्सको की सलाह एवम निर्देशों के अनुसार फार्म का निर्माण करे साथ हि बकरियों की खरीदी में विशेष एहतियात रखकर अनुवांशिक गुणों वाली उन्नत नस्लों की टीकाकरण की हुई बकरियों व बकरों का चयन करने का प्रयास करे जिससे की एक वर्ष मे अधिक शारीरिक भार ग्रहण कर सके व अधिक दुग्ध उत्पादन कर सके एवम वर्ष मे जिस समय बकरो की अधिक कीमत मिले जैसे ईद ,दिवाली ,होली आदि के समय बाज़ार का विश्लेषण कर बकरों को जीवित शारीरिक भार के आधार पर विक्रय की योजना बनाये, प्रभावी मार्केटिंग करे जिससे की हम उन बिन्दुओ पर फोकस करे जहा से हमें हमारी बकरियों एवम बकरों की अधिक से अधिक कीमत मिल सके | बकरी पालन को पूर्ण व्यवसाय के रूप में अपनाये और प्रतिदीन 6 – 8 घंटे फार्म पर रूककर स्वयं अनुभव अर्जित करे | बकरियो की संख्या धीरे -धीरे बढ़ाकर, वैज्ञानिक प्रबन्धन से ही आप 50 – 5000 बकरियों तक के लक्ष्य को हासिल कर सकते है और बकरी पालन मे लाभ अर्जित कर सकते है |

कई पारंपरिक व्यावसाय आज बदलाव के दौर में है और बकरी पालन भी उनमे से एक है| विगत कुछ वर्षो में इस व्यावसाय को लेकर कई परिवर्तन हुए है और उसके परिणामो का असर दिखने लगा है| बकरी पालन ग्रामीण बेरोजगारी, पलायन और कुपोषण को कम करने में सहायक साबित हो सकता है | इस व्यवसाय का भविष्य बहुत उज्जवल है लेकिन अभी इसके विकास के लिए कुछ बड़े परिवर्तनों की आवशयकता है

दीपक पाटीदार

CMD
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